क्यों नहीं लांघते तुम यह देहरी?
क्यों जकड़ रखा है स्वयं को मर्यादाओं के शीकंजे में?
जब वो जोंक बनकर तुम्हारा खून चूस रहे थे
तुम सह रहे थे चुप-चाप
आज जब तुम रक्त विहीन हो
क्यों नहीं लेते अपने उन रक्तों का हिसाब
जो दौड़ रहा है उनकी धमनियों में
तुम्हारी आह लिए.
कल फिर होली आएगी
और तुम रंग दिये जाओगे
फिर तुम्हारे रक्त के साथ तुम्हारा अस्तित्व भी सीमट कर रह जायेगा
इतिहास के पन्नों में
फिर वो पन्ने फाड़ दिए जायेंगे
उस नटखट बच्चे के द्वारा
जिसने अभी अभी-अभी ही सीखा है पेंसिल पकड़ना
जिसे नहीं मालूम कैसे रखा जाता है
किताबों को सहेज कर
Monday, June 9, 2008
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1 comment:
Your lines have amazing intensity and deep meaning...looking forward to reading more of your works.
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